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हमारे वनबन्धु


भारतीय संस्कृति और सभ्यता वनों में पनपी, पली, और विकसित हुई. हमारे तमाम ऋषि मुनि वनों में ही रहा करते थे. आम आदमी के जीवन का भी ७५ प्रतिशत भाग वनों में ही व्यतीत होता था. वनवासी होना सौभाग्य की बात होती थी. लेकिन पशात्य शिक्षा के प्रभाव में हम वनवासियों को जंगली समझाने लगे....उनसे हमरी दूरी बड़ी और इस दूरी का फायदा उठाकर वे उन वनों में पहुँच गए और धर्मान्तरण के द्वारा धीरे धीरे वहाँ राष्ट्रद्रोह के बीज बो दिए. आज दिख रहे नक्सली एवं वनवासी विद्रोह के पीछे यही मूल कारण रहा. इन वनवासियों की पीड़ा तथा वनबन्धु परिषद द्वारा किये जा रहे सेवा कार्यों के विषय बाबाजी द्वारा को कई बार चित्रमाला का स्वरूप देकर प्रदर्शित किया गया. रांची, मुंबई, देल्ही, सूरत आदि कई स्थानों पर इसका प्रदर्शन किया जा चुका है.