भारत माँ की आरती॥ (बाबा सत्यनारायण मौर्य)
June 8th, 2007|
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” दो शब्दों की दिव्य चेतना राष्ट्रभाव संचारती।
वन्देमातरम् गाकर कर लो भारत माँ की आरती “
विश्व में एकमात्र देश है भारत, जिसे वहॉं के निवासियों ने मॉं कहकर वन्दना की। जहॉं देशभक्ति को धर्म मान कर अपनाया जाता रहा। राष्ट्रभाव को मॉं-बेटे के पावन नाते से जोड़ दिया। वैदिक काल के भूमिसूक्त को काव्यात्मक रुप मिला बंकिमचंद की लेखनी द्वारा वन्दे मातरम के रूप में। भारत की शस्यश्यामला भूमि प्रतिष्ठित हुई दशप्रहरणधारिणी दुर्गा के रूप में……एक शब्द आंदोलन बन गया। देश पर सर्वस्व चढ़ाने वालों की प्रेरणा स्त्रोत बन गया।
इसी गीत को नवीन आयामों के साथ मंचीय रूप दिया गया है इस कार्यक्रम में। अपनी विविध कलाओं के सूत्र में राष्ट्रीय विचारों तथा वर्तमान परिस्थितियों को पिरोकर यह मंचीय कार्यक्रम बाबा की अभिनव प्रस्तुति है। चित्रकारी, गीत-संगीत, और काव्य के विविध रंगों से रंगा यह कार्यक्रम दुनियॉ में अपने ढंग का एकमात्र प्रयोग है। जो महानगरों से लेकर छोटे-छोटे गॉंवों तक समान रूप से देखा और सराहा गया है। हर वर्ग के दर्शक इस कार्यक्रम में श्रोता बाबा के शब्दों की धारा में बहने लगते हैं। जिस दिन कार्यक्रम आयोजित होता है स्वतंत्रता दिवस या गणतंत्र दिवस का सा माहौल निर्मित हो जाता है।
यह कार्यक्रम कोरी बौद्धिकता, कोरी आदर्शवादिता या मनोरंजन नहीं, व्यवहारिक देशभक्ति जागरण का एक अभियान बन चुका है। हर कला की अपनी विशेषता तो होती है पर सीमायें भी होती है। इसलिये विभिन्न कलाओं को जोड़ कर सीमाओं का विस्तार करके यह कार्यक्रम राष्ट्रदेव के यज्ञ का माध्यम बन रहा है। इस कार्यक्रम में हास्य व्यंग्य एवं वीर रस की कविताओं, राष्ट्रगौरव के विषयों, भक्ति संगीत तथा देशभक्ति गीतों के साथ ही साथ देश के महान सपूत महापुरूषों का चित्रांकन बड़े कैनवास पर किया जाता है।


